पर्यावरण संरक्षण मा नागरिक बोध जरूरी
देहरादून। चिपको आंदोलन का प्रणेता सुन्दरलाल बहुगुणा को बोनुु छ बलकि पारिस्थितिकी मनखि अर प्रकृति का संबंधों को शास्त्र छ। हम जब आर्थिक लाभ वास्ता जंगळों को दोहन कर्दा त थोड़ा टैम का वास्ता हमतैं फैदा जरूर नजर औंद पर सदान्यों खुण हम विनाश कि बुन्याद रख दिंदा।
बहुगुणा जी को यो कथन, पर्यावरण तैं बचौणा हिसाब से अकाट्य अर अनुभवों कि धरती पर उपजी सोच को सार छ। अब अगर हम थोड़ा सि ये विचार पर मंथन करां त लगलो कि आम आदिम वास्ता यो सिर्फ एक शब्द जाळ छ। न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण पर काम कन वळों बल्कि येका नौ पर नौ कमौण वळों खुण सिर्फ समणि वळों तैं प्रेरित कनौ एक साधन भर छ। वूंतैं पर्यावरण बचौण य फिर मनखि का वास्ता महा विनाश कि बुन्याद तयार होण से क्वी मतलब नी छ। वो सिर्फ बोदा छन । कर्दा नि छन। वो सिर्फ करौणो बोदन अर यि हवाई लफ्रफाजी अखबारी सुर्खीे बणदन वखि वूंका ये नाटक से कैतैं फैदा होण वळो नी छ। खुद वूं तथाकथित पर्यावरणवाद्यों य नेतों तैं
बि कुछ मिल्न वळो नी छ।
विश्व पर्यावरण दिवस पर दुन्य मा आह्वान करे जांद कि कैं तरां से बि पर्यावरण कि सेहत सलामत रखणा उयार करे जावन पर सिर्फ बोन से कुछ बि होण्य नी छ। जब तक यि शब्द कर्म मा नि बदले जांदा। बड़ा-बड़ा शहरों मा रैली निकाळी सिर्फ हम लोगु खुण परेशानी बि वजै बण सकदां। जब तक आम ग्रामीणों, युवाओं अर महिला शक्ति तैं यी बातौ अहसास नि होलो कि पर्यावरण रक्षा कैकि वो प्रकृति तैं बचौणो प्रयास कना छां तब तक सब कुछ हवाई साबित होलो। पृथ्वी आज सलामत छत सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण का बल पर। जबकि भौतिकवादी सोच का लोग यूंतैं राष्ट्र विशेष कि पूंजी मानी चल्दन। जल-जंगल-जमीन मानव जीवन का आधार छन। यूंकि तुलना पूंजी से कनु घातक छ।
वैश्विक स्तर का सर्वेक्षण से पता चल्द कि पिछला 20 साल मा 15 सौ करोड़ डाळा काट दिये ग्येनि। सिर्फ पूंजी का दृष्टिकोण से यी सम्पत्ति को अनैतिक दोहन मनख्यों खुण खतरा कि घण्टी छ। वो डाळा जो कि क्लाइमेट चेज कन वळा सीओटू गैस बचैकि रखदन यांसेे यांक उत्सर्जन कि गति बढ़ ग्ये। पूरी दुन्य वृक्ष विनाश को नतीजा द्यखणी छ पर यांपर रोक वास्ता क्वी सर्वग्राही सोच विकसित कनौ कैका पास बि कारगार तकनीक नी छ। सिर्फ पिछला पांच साल मा धरती पर आठ प्रतिशत प्रदूषण बढ़ ग्ये। यो प्रतिशत अगर यिनि बढ़द रालो त अगला 50 साल मा क्य गारंटी “वे सकद कि हमरो जीवन सुखमय रै सकलो। बढ़दा तापमान का चल्द औण विळ प्राकृतिक आपदों मा बढ़ोत्तरी होलि। भूजल स्तर मा कमी औण से पेयजल संकट राष्ट्रीय आपदा को स्वरूप ल्हे लेलो। यिनि स्थिति कि कल्पना कर्द हि विचारकों तैं चिंतित “वे जाण चयेणू छ। न सिर्फ चिंता कनु बल्कि एक ग्लोबल आह्वान करे जाण चयेणू छ। जैमा पारिस्थितिकी क्षरण से होण वळा नुकसान को लेखाजोखा हो। य बात आम आमिदै समझ मा डळ्न पड़लि।
यांखुण धरती तैं बचौणो सतत अर्थतंत्र वळा डालों तैं बचौणै जर्वत छ। विकास का नौं पर होण वळा प्रयोगों से आम आदिम परेशान छ। वो यीं परेशानी को सबब एक सामयिक प्रक्रिया समझी चल्नू छ पर असल बात वेकि समझ से भैर छ। किलै कि प्रकृति संरक्षण हमरि संस्कृति को हिस्सा नि बणे सकणू छ। एकदां डाळ्यूें तैं बचौणों गौरादेवी का नेतृत्व सुन्दरलाल बहुगुणा अर चण्डी प्रसाद भट्ट का दिशा निर्देशन मा चिपको आंदोलन चलै ग्ये छौ। भले ही तब यो आंदोलने लोग्वी आर्थिकी अर जीवंतता से जुड्यूं रै हो, भले ही तब यि नेता अर महिला शक्ति ये आंदोलन का मर्म से अजाण रै होला पर कालांतर मा लोगुन अपण बणों कि रक्षा कैकि साबित कर द्ये कि अगर जंगळ निराला त वूंको बि अस्तित्व शेष नि रैण्य।
यी वजै छ कि यूं पर्यावरणीय दगड्यों को विश्व स्तर पर सम्मान करे ग्ये। देश का नेतोंन भले ही डाळ्यों का यूं रखवाळों को प्रयास अंक्वे नि आंकि हो पर विश्व स्तरीय संस्थों न यूंका प्रयास तैं अति महत्ववूर्ण समझि। एक अति सामान्य ग्रामीण जनानि तैं पृथ्वी सम्मेलन मा मुख्य वक्तों का मंच को हिस्सा बणै ग्ये। ठेेठ पहाड़ी पहनावा विळ गौरादेवी को उद्बोधन ठेठ पहाड़ी भाषा मा छौ अर वेको अंग्रेजी मा अनुवाद होणू रये। बोनो मतलब यो कि यी सम्मान समारोह अगर देश मा होंदो त यांको संदेशे जादा प्रभावी होणु छौ। आम आदिम का एक भाव पैदा होंदो कि पर्यावरण का वास्ता अगर कुछ विशेष करे जाव त राष्ट्रीय स्तर पर वेतैं क्य सम्मान मिल्द।
मौलिकता से जुड्यूं एक मुद्दा यो बि छ कि पलायन का चल्द गौं सूना होणा छन अर शहरी विस्तार तेजी मा छा रैण खुण बहुमंजिला भवन बण्यां छन। लगणू छ जनकि यि सर्गे लौंफ्रयोंदा कूड़ा आमंत्रित कना होवन कि गौं छोड़ा आवा शहरों मा तुमर वास्ता सर्व सुविधा सम्पन्न आवास हाजिर छन। खासतौर पर पहाड़ी जनजीवन खात्मा कि तर्फ बढ़द जाणू छ। लोग गौं छोड़ी मैदांनुद बौगण पर लग्यां छन। अब वो पुंगड़ा जौंमा कबि किसाण कि मेहनत को परिणाम धान्य का रूप मा उत्पादित होंदो छै। वो रूखी अर कराळी उजाड़ धरती कि अन्वार ल्हेकि खड़ा छन। वख हैर्याळी होयां एक अर्सा बीत ग्ये। पर्यावरण तै जैं खेती का चल्द हर्याळी मिल्दी छै अर जै खेती का चल्द धरती मा बरखौ पाणि धारण कनै शक्ति औंदी छै वो आज बंजर अर श्मशान जनि होयीं छ। पर्यावरण का लिहाज से यो सर्वनाश को संकेत छ।
पर्यावरण संरक्षण वास्ता हवा-मिट्टी-अर पाणि को बचाव करे जाणु जरूरी छ। यो संदेश देश कि सत्ता कि तर्फ बटी औण चयेणू छ। रैबार यिनु हो कि लोगु मा बाध्यता ऐ जाव कि वो यूं तीन विधों पर केन्द्रित “वे जाव। अबि पिछला दिनु आस्ट्रेलिया मा जब चुनोै “वे त वख मुद्दा छा। जल-जंगळ अर जमीन को संरक्षण। यानि चुनौ जितणो प्रत्याश्योंन जनता से वादा करि छौ कि अगर वो जीत ग्ये त पर्यावरण बचौणो अपणि नीति तैं जल-जंगळ-जमीन को संरक्षण करला। अब अगर आस्ट्रेलिया यिनु कर सकद त भारत मा किलै नि “वे सकदो यिनु। वख यो मुद्दा यिलै प्रमुख बणि कि भयंकर सूखा कारण आस्ट्रेलिया भितर तक सहम ग्ये छौ। यांसे जल-जंगळ जमीन से जुड़ी तमाम सम्पत्यों तैं भारि नुकसान “वे। सूखा कारण जगा-जगा बणाग लगण से करीब 90 हजार हेक्टेयर जंगळ खत्म “वे ग्येनि। यी वजैे छ कि वखा राजनीतिक दलों न जनहित का यूं मामलों तैं अपण घोषणा पत्रें मा प्रमुखता दिनी। चीन ये मामला मा जो प्रयास कनू छ वेका सकारात्मक नतीजा समणि औणा छन। वखा शहर वीजिंग अर शंघाई वायु प्रदूषण से सर्वाधिक प्रभावित छा पर आज वो सुधार कि प्रक्रिया मा चल्ना छन।
अपण देशैे स्थिति सिर्फ व्यक्ति परक “वेकि रैग्ये। देश का जिम्मेदार लोग सिर्फ बागडोर अपण हाथ मा रखणो प्रयासरत छन। वूंतैं यांक सिवा कुछ नजर नि औणू छ। हवा, पाणि, जंगळ, मिट्टी का हालात त समाज तैं विचलित कर्दा अर न सत्ताधीशों तैं। यी वजै छ कि अपण देश मा पर्यावरण क्वी मुद्दा न बण सकि। यो हि न यि जिम्मेदार लोग पारिस्थितिकी पर आधारित ग्लोबल रिपोर्ट तैं हवाई समझी रद्दी कि टोकरी लैक समझणा छन। स्पष्ट छ कि जब तक पर्यावरण तैें राजनीति को हिस्सा नि बणै जांदो। तब तक नेता लोग येतैं प्राथमिकता नि देण्य। अर जब तक यो चुनौ को मुद्दा नि बण जांदो तब तक यो राष्ट्रीय स्वरूप नि ल्हे सकदो। यांक वास्ता आम आदिमै समझ मा औणू जरूरी छ कि जल-जंगळ-जमीन अगर सलामत छ त वेको अस्तित्वे बण्यूं रालो निथर औण वळों टैम यिथगा भयानक होलो कि वेकि कल्पना बि नि करे जै सकदी।
पर्यावरण संरक्षण मा नागरिक बोध जरूरी