देहरादून। आयुष्मान कार्ड का सिलसिला मा एक मित्र दगड़ि तैसील गयों। डिस्पेंसरी रोड स्थित राजीव गांधी बहुउद्देश्यीय कॉम्पलैक्स कि चौथी मंजिल मा छ तैसील दफ्रतर। पता चलि कि आयुष्मान कार्ड निचली मंजिल मा बणना छन। हम दफ्रतर ख्वजद-ख्वजद वे दफ्रतर पौंछौं त वख लोग्वी लंग्यात पैलि बटी लगीं मिलि। चला हम बि लैन मा लग गयां।
ये बीच मैतै शौचालै जाण पड़ ग्ये। मित्र तैं लैन मा खड़ु कैकि निचली मंजिल स्थित सुलभ शौचालै पौंछ ग्यों। पर शौचालै पर ताळु लग्यूं मिलि। दर्वाजा पर एक चिट लगीं छै जैमा ल्यख्यूं छौ, ''पाणि नी छ।''
मन भारी कखि हौर खुला मा समस्या से मुक्त होयाें पर एक कसक सि दिल मा उठि कि करोड़ों रूप्ये खर्च कैकि एमडीडीए न यो भव्य कॉम्पलैक्स बणै पर एका एक मात्र शौचालै मा पाणि कि व्यवस्था नि करि। यो कनक्वे “वे सकद।
दिमाग मा सरकारी व्यवस्था का प्रति कडुपन ल्हेकि वापस आयुष्मान कार्ड बणौण वळा दफ्रतर पौंछ ग्यों। तब तक वूंकों नम्बर ऐ ग्ये छौ। पर कुछ अड़चन का कारण कार्ड कि समस्या हल नि “वे सकि। ये बीच दगड्य तैं बि बाथरूम जाणै जर्वत पड़ि पर जब मैन वस्तु स्थिति से वूंतैें अवगत करै त वो धकक रै ग्येनि। बोन बैठिन कि यिनु कनक्वे “वे सकद। सैकड़ों लोग यख काम करौणो आैंदन वूंमा कथगै बुजुर्ग अर जनाना बि होंदन। अगर वूंतैं शौचालैे पर ताळु लटक्यूं मिललो त बिचरा कख जाला।
बतौंद चल्दौें कि म्यरा मित्रवर पुलिस विभाग से अधिकारी रिटायर छन। पुलिसिया खोपड़ी घूम ग्ये। बोन बैठिन, चलु ''पुछदा ये कॉप्लैक्स का जिम्मेदार मनखि तैं। हमरि बात एक हौर बुजुर्ग बि सुण्ना छा। वो बोन बैठिन, ''अरे साब ये कॉम्पलैक्स को क्वी प्रभारी नी छ। मै बि तुमर तरां परेशान छौं। मैतैं शुगर कि समस्या छ। हर्बि-हर्बि बाथरूम जाण पड़द पर यख शौचालैे पर ताळु लटक्यूं देखी मैतैं बि निराशा “वे। फिर कखि दिवाल कि ओट ल्हेकि समस्या को निदान करि।''
मैं स्वचणू रै ग्यों कि कॉम्पलैक्स मा सौ का करीब दुकानि छन। यो हि न 10-12 सरकारी कार्यालै बि स्थित छन। पर यो क्य बंदोबस्त छ कि ये पूरो कॉम्पलैक्स को एकमात्र शौचालै बंद पडयूं छ। वो बि पाणि कि अनुपलब्धता का कारण। जनता भारी परेशानी मा छ अर व्यवस्था कन वळा सब कुछ देखी चुप बैठ्यां छन।
बुजुर्गवार तैं छोड़ी हम सीढ़ी उतर ग्यां। हमुन सोचि यख कै ढंगा दुकानदार से वस्तुस्थिति को पता कर्दा। पैलि मंजिल मा हि जुत्तों कि दुकान खोली बैठ्यां एक अधेड़ लाला का गळा पड़ ग्यां। जैराम जी कना बाद हम असली मुद्दा पर ऐ ग्यां। कि जनाब यिथगा बड़ो शॉपिंग कॉम्पलैक्स छ पर वेकोे एकमात्र शौचालै बंद पड्यूं छ।
लाला बि शैदे यीं अव्यवस्था से परेशान छौ। बोन बैठ, ''दर्वाजा पर एक चिट लगीं देखी होलि तुमन। बस यीं परेशानी का चल्द शौचालै बंद पड्यूं छ। हम ब्योपार्यों खुण भारि समस्या पैदो होयीं छ। यी वजै का चल्द भैर निबटणो घर जाण पड़द। क्य कन हमारि रोजी-रोटी यख से जुड़ीं छ निथर यो कॉम्पलैक्स कै कामौ नी छ।''
पुछण पर कि यिनि स्थिति किलै होंयी छ त व्योपारीे न ज्व कथा समझैे वो कुछ यिनि छ। सरकारी अधिकार्याें का गैरे जिम्मेदाराना रवैया का चल्द उत्तराखण्ड पावर कारपोरेशन कि तर्फ बटी कॉम्पलैक्स कि बिजली काट दिये ग्ये। बिल छ बल सिर्फ 68 हजार रूप्य। तकादा कन पर जब कॉम्पलैक्स का जिम्मेदार ना नुकुर पर उतर्यां रैनि त विभागन बिजली काट दिये ग्ये। अब चूंकि कॉम्पलैक्स मा पाणि पंम्पिग द्वारा ऐंच चढ़ैे जांद ये वास्ता बिजली का अभाव मा पम्प नि चलण से पाणि का अभाव मा शौचालै पर ताळु लग्यूं छ।
बतै ग्ये कि बिल भुगतान का नौं पर जिम्मेदार लोग बतौणा छन कि चूंकि यखौ बिजली कनैक्शन तैसीलदार का नौ से होयूं छ। ये वास्ता यांखुण वी जिम्मेदार छन। पर तैसीलदार एमसी रमोला यीं बात से अनभिज्ञ छन। वूंको बोनू छ कि वूंतैं पता बि नी छ वूंका नौ कब कनैक्शन ल्हिये ग्ये। यो कि वूंका नौं से कनैक्शन कै आधार पर दिये ग्ये।
रमोला जी को तर्क बि काफी हद तक जायज लगणू छौ। पता चलि कि कॉम्पलैक्स को निर्माण एमडीडीए न 2013-14 मा करै छौ। बस वेकि जिम्मेदारी यखि तक छै। अब चूंकि ये पूरा परिसर मा सौ ब्योपार्यों कि दुकानि छन। यो हि न तमाम सरकारी विभागों न बि दफ्रतर ख्वल्यां छन। कैदा यो छ कि चूंकि यि सब लोग बिजली को उपयोग कर्दन त बिल भुगतान यूंतैं हि कन चयेणू छ। पर दुख यीं बातौ छ कि पांच सालेेे बाद तक बि ये मामला मा क्वी नीति तयार नि करे ग्ये।
ये कॉपम्लैक्स मा उत्तराखण्ड आवास एवं नगर विकास प्राधिकरण (उडा) को बि दफ्रतर छ। वी यखा वाहन पार्किंग को ठेका बि जारी कर्द। अबैदां यो ठेका 45 लाख मा छुटि उड़ा न बोर्ड कि बैठक मा तै करि छौे कि बार-बार खराब होण विळ लिफ्रट संचालन कि जिम्मेदारी बि वी उठालो। ये हिसाब से बिजली बिल भुगताने कि जिम्मेदारी उड़ा कि होंद पर अधिकार्यों न ये संबंध मा क्वी फैसला नि करि। ये यी घपरोळ मा काम्पलैक्स कि बिजली कटीं छ। हम सोच मा पड़ ग्याें कि सरकारी व्यवस्था मा गैर जिम्मेदारी अर निकम्मापन कि भावना कब खत्म होलि। उडा का अधिकारी जब काम्पलैक्स कि पार्किंग से 45 लाख उठौणा छन अर खर्चे एक कर्मचारी कि तनखा का सिवा कुछ न्ही त सिर्फ 68 हजार को बिल किलै होण दिये ग्ये। अब चूंकि बिल बड़ोे “वे ग्ये त उठा तैं भुगतान कर लेण चयेणू छौ। पर चूंकि यो सब पंचैती हिसाब छ। ये वास्ता जनतै परवा कैथैं छ।
बुजुर्गो वास्ता आफत छ तैसील पौंछणु